
अजीत मिश्रा (खोजी)
कबीर तिवारी हत्याकांड – खाकी और रसूख की ‘फाइल’ पर न्याय का हथौड़ा, अब कटघरे में होंगे सात ‘खास’ आरोपी
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश।
- साजिश की ‘क्लोजर रिपोर्ट’ फाड़कर कोर्ट ने दिखाई सख्ती, कबीर के ‘कातिलों’ की उल्टी गिनती शुरू!
- मंत्री की पैरवी भी न बचा सकी ‘खास’ चेहरों को, कबीर हत्याकांड में कोर्ट ने तोड़ा रसूख का तिलस्म!
- खाकी ने जिसे कहा ‘बेगुनाह’, जज ने उसे माना ‘गुनाहगार’—कबीर तिवारी केस में बड़ा उलटफेर!
- बस्ती का चर्चित मर्डर केस: क्या अब खाकी के मददगारों को जेल भेज पाएगी कानून की ताकत?
बस्ती (ब्यूरो रिपोर्ट)। बस्ती की छात्र राजनीति के चमकते सितारे कबीर तिवारी की हत्या को सात साल बीत गए, लेकिन इंसाफ की उम्मीद आज भी उन गलियों में जिंदा है जहाँ कबीर की लहू बहा था। उत्तर प्रदेश की सीबीसीआईडी (CBCID) जिस मामले को ‘ठंडे बस्ते’ में डालकर फाइलों पर धूल जमा चुकी थी, उसे बस्ती की अदालत ने एक झटके में हिला कर रख दिया है। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रमोद कुमार गिरि ने सीबीसीआईडी की क्लोजर रिपोर्ट को दरकिनार करते हुए सात रसूखदार आरोपियों को धारा 302 और 120B जैसी संगीन धाराओं में तलब कर लिया है।
यह फैसला केवल एक अदालती आदेश नहीं है, बल्कि उन सफेदपोशों के लिए चेतावनी है जो समझते थे कि सत्ता की पैरवी और पुलिसिया जांच को खरीदकर वे कानून से ऊपर हो गए हैं।
जांच के नाम पर ‘मजाक’: जब कातिलों के करीबियों ने ही दी ‘क्लीन चिट’
इस मामले में सीबीसीआईडी की भूमिका शुरू से ही संदिग्ध रही। दिनदहाड़े मालवीय मार्ग पर डॉ. के आवास के सामने हुई इस जघन्य हत्या को लेकर प्रदेश सरकार के एक मंत्री की पैरवी पर जांच सीबीसीआईडी को सौंपी गई थी। आरोप है कि जांच एजेंसी ने अपनी साख को ताक पर रखकर केवल उन लोगों के शपथ पत्रों को आधार बनाया जो आरोपियों के सगे-संबंधी और करीबी थे।कबीर तिवारी की दिनदहाड़े मालवीय मार्ग पर हत्या कर दी गई थी। सवाल यह है कि जिस प्रदेश में कानून के राज का दावा किया जाता है, वहां एक होनहार छात्र नेता की हत्या के आरोपियों को बचाने के लिए सीबीसीआईडी (CBCID) ने अपनी पूरी ताकत क्यों झोंक दी थी? सीबीसीआईडी ने शपथ पत्रों के आधार पर आरोपियों को क्लीन चिट दे दी थी, जैसे कि अदालत का काम अब पुलिस के मुंशी ही करेंगे।
लेखनी की धार से यह कहना गलत नहीं होगा कि सीबीसीआईडी की जांच किसी रसूखदार मंत्री की पैरवी और प्रभावशाली लोगों के दबाव में नतमस्तक थी। आरोपियों के करीबियों से शपथ पत्र दिलवाकर उन्हें मुक्त कर देना न्याय का गला घोंटने जैसा था।
अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए माना कि सीबीसीआईडी ने बिना किसी न्यायिक परीक्षण के आरोपियों को मुक्त कर दिया था। क्या अब उत्तर प्रदेश में अपराधियों का फैसला उनके अपने रिश्तेदारों के शपथ पत्रों से होगा? यह सवाल आज बस्ती का हर नागरिक पूछ रहा है।
धारा 319 का प्रहार: टूटी रसूखदारों की ढाल
वादी मुकदमा शिवप्रसाद तिवारी और अधिवक्ता संजय कुमार उपाध्याय की अटूट कानूनी लड़ाई ने रंग दिखाया। 12 मार्च 2026 को अदालत में पेश की गई दलीलों में स्पष्ट किया गया कि पत्रावली पर पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं, जिन्हें जांच एजेंसी ने जानबूझकर अनदेखा किया।
अदालत ने अब निम्नलिखित आरोपियों को 20 मई 2026 को अदालत में हाजिर होने का कड़ा आदेश दिया है:
- अमन प्रताप सिंह (पुत्र पूर्व प्रमुख महेश सिंह)
- अक्षय प्रताप सिंह
- मोहम्मद साद उर्फ सद्दू
- समीर खान
- साहिल सिंह
- अवनीश सिंह
- इमरान उर्फ शिबू
छात्र राजनीति की रंजिश और कत्ल की साजिश
एपीएन पीजी कॉलेज की छात्र राजनीति से शुरू हुई यह दुश्मनी हत्या तक जा पहुँची। वादी के अनुसार, कॉलेज की पुरानी रंजिश को लेकर अमन सिंह और साद उर्फ सद्दू ने कबीर को घेरकर उसकी जान ली थी। सीबीसीआईडी ने मामले को उलझाने और विलंबित करने की हर संभव कोशिश की, लेकिन साक्ष्यों की ‘अखंडता’ ने पुलिसिया खेल बिगाड़ दिया।
रसूख बनाम न्याय: अब क्या होगा?
न्यायालय ने इन सभी पर भारतीय दंड संहिता की धारा 147, 148, 149, 302 और 120B के तहत आरोप तय करने के लिए तलब किया है। यह उन लोगों के लिए करारा जवाब है जो क्लोजर रिपोर्ट आने के बाद जश्न मना रहे थे।
बस्ती मंडल की जनता अब यह देख रही है कि क्या 20 मई को ये रसूखदार आरोपी कानून का सम्मान करते हुए समर्पण करेंगे, या एक बार फिर किसी ‘बड़े नाम’ की ओट में छिपने का प्रयास करेंगे। कबीर तिवारी हत्याकांड की यह फाइल अब बंद नहीं होगी, बल्कि उन चेहरों को बेनकाब करेगी जो सात साल से न्याय के रास्ते में रोड़ा बने हुए थे।
सावधान रहें रसूखदारों, क्योंकि न्याय की चौखट पर अब हिसाब होगा!


















